बच्चों के प्रति बढ़ते अपराध: कारण, प्रभाव, रोकथाम उपाय और POCSO Act में सुधार की आवश्यकता
कार्यकारी सारांश
भारत में पिछले दशक में बच्चों के प्रति यौन अपराधों में निरंतर वृद्धि देखी गई है। 2023 में NCRB के अनुसार 1,77,335 अपराध दर्ज हुए, जिनमें अपहरण/अब्डक्शन (45.0%) और POCSO मामलों (38.2%) की हिस्सेदारी सबसे अधिक थी। कोविड-19 के बाद ऑनलाइन यौन अपराध भी चरम पर पहुँच गए – 2019 में 164 दर्ज मामलों की तुलना में 2020 में 842 मामले (400% वृद्धि) हुए। अपराधियों में बहुसंख्यक पीड़ित को परिचित (परिवार/मित्र/ऑनलाइन मित्र) पाया गया। जाँच एवं निपटान धीमा है; POCSO मामलों में दोषसिद्धि दर लगभग 34% (2017–19) है। मौजूदा कानून (POCSO, IT अधिनियम, IPC) प्रभावी हैं पर कार्यान्वयन में कमी, जागरूकता की कमी एवं सामाजिक कलंक जैसे बड़े अवरोध हैं। सुधार हेतु POCSO में त्वरित सुनवाई, पीड़िता की सुरक्षा, सहमति की आयु, रिपोर्टिंग व्यवस्था, डिजिटल साक्ष्य आदि पर बल देने की आवश्यकता है। बचाव, पहचान, अभियोजन और पुनर्वास के लिए बहु-क्षेत्रीय समन्वय तंत्र बनाए जाने चाहिए। नीचे विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है।
अपराधों के प्रकार और प्रवृत्ति
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बच्चों के प्रति अपराध की संख्या 2017 से बढ़ी है। NCRB रिपोर्टों के मुताबिक 2017 में कुल 129,032 अपराध दर्ज थे, जो 2019 तक बढ़कर 148,185 हुए। इनमें POCSO केसों की वृद्धि और तेज रही: 2017 के 32,608 से बढ़कर 2019 में 47,335 केस हो गए। 2021 में 1,49,404 मामलों में 53,874 (36.05%) POCSO केस थे। 2022 में कुल 1,62,449 अपराध हुए, जिनमें से 39.7% POCSO मामले थे।
विशेष रूप से ऑनलाइन यौन अपराध में उछाल आया: 2019 में 164 दर्ज केस 2020 में 842 तक पहुंच गए (400% वृद्धि)। अधिकांश ऑनलाइन केस यौन चित्र/वीडियो प्रकाशित करने संबंधी थे। इसके अलावा घरेलू/परिवारिक शोषण (घर में पिता, रिश्तेदार द्वारा), बाल तस्करी (यौन उद्देश्यों के लिए अपहरण/व्यापार) और बाल विवाह में यौन शोषण (बलपूर्वक शादी कराना) भी आम हैं। उदाहरण के लिए 2023 में बालिकाओं को जबरन विवाह के लिए अपहरण के 14,637 मामले दर्ज हुए। नीचे सारणी विभिन्न अपराध प्रकारों की तुलना देती है:
बच्चों पर अपराध का शिकार अधिकतर किशोर (12–18) होते हैं: 2023 में दर्ज 40,846 पीड़ितों में से 36,855 (90%) की आयु 12–18 वर्ष के बीच थी। विशेषज्ञ कहते हैं कि सामाजिक तौर-तरीके (पितृसत्ता, वर्जनाएँ) और डिजिटल पहुँच दोनों ने इस प्रवृत्ति को प्रभावित किया है।
कारण एवं जोखिम-कारक
बाल यौन अपराधों के बढ़ने के अनेक स्तरगत कारण हैं। व्यक्तिगत स्तर पर यौन शिक्षा की कमी, आत्मगोपनीयता की जिज्ञासा व विश्वास की कमी, मानसिक/मनोवैज्ञानिक अस्थिरता (जैसे विकृति, आत्मसम्मान दोष) अपराधी के जोखिम को बढ़ाती है। पारिवारिक माहौल (घर में हिंसा, नशाखोरी, अलगाव) और अकेलापन बच्चे को असहाय बनाते हैं। सामाजिक-आर्थिक कारकों में गरीबी, पलायन, बाल श्रम, अनपढ़ता और लैंगिक असमानता प्रमुख हैं। उदाहरण के लिए, पितृसत्तात्मक समाज में सेक्स से जुड़ी कलंकित मान्यताएँ पीड़ितों को चुप रहने पर मजबूर करती हैं। एक सर्वे में अधिकांश उत्तरदाताओं ने बताया कि उनका सामाजिक परिवेश ‘पितृसत्तात्मक, घृणास्पद या असंवेदनशील’ है, जिससे बलात्कार की रिपोर्टिंग कम होती है।
स्थानीय स्तर पर तेज डिजीटल तकनीकी पहुँच (स्मार्टफोन, इंटरनेट) ने बच्चों को ऑनलाइन जोखिमों (ऑनलाइन अश्लीलता, ग्रूमिंग, साइबर बुलिंग) के प्रति संवेदनशील बनाया है। कानून प्रवर्तन और संस्थागत स्तर पर क्षमता की कमी, संसाधन-अभाव, संवेदनशील प्रशिक्षण की कमी और मुकदमों की लंबितता अपराधों के लिए जोखिम कारक हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में जागरूकता न होना, सामाजिक सुरक्षा तंत्र का अभाव और मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी जोखिम बढ़ाती है।
रोकथाम एवं प्रतिक्रिया प्रयास
सरकार और समाज कई स्तर पर बचाव और प्रतिकार के प्रयास कर रहे हैं। कानूनी स्तर पर, 2012 में POCSO अधिनियम बनाया गया जिसने बाल यौन अपराधों को विशेष रूप से दंडनीय बनाया। धारा 12 में ऑनलाइन उत्पीड़न दंडनीय है, धारा 13 बाल पॉर्नोग्राफी कृत्यों पर रोक लगाती है, तथा धारा 14-15 में अपराधों के लिए कठोर सजाएँ तय हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (धारा 67,67A,67B) बाल अश्लीलता पर दंड देता है। 2023 में भारतीय न्याय संहिता ने भी ऑनलाइन अश्लीलता (धारा 294) और विशेषकर बच्चों को अश्लील सामग्री से बचाने (धारा 295) के प्रावधान मजबूत किए। पुलिसिंग में, प्रत्येक जिले में विशेष बाल पुलिस इकाइयाँ (SJPU) हैं और राष्ट्रीय बाल व कोटि आयोग (NCPCR) बच्चों की सुरक्षा निगरानी करता है। न्यायपालिका में फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें (FTSC) एवं ई-POCSO अदालतें स्थापित की गई हैं; 31.12.2025 तक 398 ई-POCSO अदालतों द्वारा 2,35,723 मामलों का निपटान हो चुका है।
बचपन सुरक्षा सेवाएँ (ICPS) के तहत आश्रय गृह, पलायन बाल केंद्र, बाल सुरaksha केन्द्र और चाइल्डलाइन (1098) जैसे कार्यक्रम चल रहे हैं। स्कूल शिक्षा में पोषण, स्वास्थ्य व जीवन कौशल पाठ्यक्रम के तहत आत्मरक्षा शिक्षा और साइबर सुरक्षा मॉड्यूल शामिल किए गए हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में मैडिको-लीगल उपचार सुविधाएँ, मनोसामाजिक परामर्श तथा PTSD लॉन्ग-टर्म केयर उपलब्ध कराने पर जोर है। नागरिक समाज और NGO भी सक्रिय हैं – जैसे अर्पण, बचपन बचाओ आन्दोलन, महिला एवं बाल कल्याण संस्थान आदि बाल अधिकार जागरूकता, पीड़ित सहायता और प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करते हैं।
इन पहलों के बावजूद कई अंतरों (गैप) हैं: पुलिस प्रशिक्षण अपर्याप्त, CWC/CHRC को मजबूती नहीं, स्कूलों में समग्र सुरक्षित माहौल नहीं, और गरीब क्षेत्र में नियम लागू नहीं हो पाते। जागरूकता अभियानों की पहुँच सीमित है। सामाजिक कलंक एवं बदनामी के डर से पीड़ित रिपोर्ट नहीं करते। नीचे सारणी में कुछ प्रमुख कार्यक्रमों का सारांश दिया गया है:
(उपर्युक्त सारणी उद्देश्य के लिए है; उपलब्ध आंकड़े समयानुसार भिन्न हो सकते हैं।)
कानूनी सुधारों की सिफारिशें (POCSO एक्ट)
POCSO अधिनियम वर्तमान में सख्त है, पर सुधार की गुंजाइश है। प्रमुख सुधार सूचियाँ इस प्रकार हैं:
- सहमति की आयु (Age of Consent): वर्तमान में अधिनियम की परिभाषा के अनुसार 18 वर्ष से कम किसी भी सहमति को अवैध माना जाता है। उच्च न्यायालयों ने 16 वर्ष की सहमति की पैरवी की है, लेकिन सरकार ने 2024 में संशोधन की कोई योजना नहीं बताई। विचारणीय है कि यदि दोनों पक्ष नाबालिग हों और एक सहमत हों, तो कानून में इस स्थिति के लिए स्पष्ट अपवाद हों। उदाहरण के लिए 16–18 वर्ष के किशोरों में सहमति संबंधी मामलों को संवेदनशील तरीके से निपटाया जाए।
- अनिवार्य रिपोर्टिंग का स्वरूप: सत्र 19 में सबको रिपोर्ट करने की बाध्यता है, पर आलोचक कहते हैं कि इससे पीड़ित या डॉक्टर सहायता के लिए आने से हिचकते हैं। इसलिए रिपोर्टिंग विधेयक को संशोधित करके गोपनीयता बनाए रखने और सामाजिक कोप से बचाने वाले प्रावधान किए जाएँ। रिपोर्ट करने पर कानूनी दंड हटाकर सिर्फ प्रोत्साहन-दंड संहिता (प्रोत्साहन पुरस्कार/कानूनी संरक्षण) लागू किया जा सकता है।
- प्रक्रियात्मक सुधार: मामलों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने हेतु समय-सीमा बाध्य तय करें। हर जिले में विशेष बाल अदालतें एवं बाल जांच इकाइयाँ (SJPU) सशक्त बनाएं। बाल-पोषण (child-friendly) बयानों के लिए विशेष ट्रेनिंग और वीडियो कांफ्रेंसिंग सुविधा अनिवार्य करें। बलात्कार व POCSO मामलों की फास्ट-ट्रैक में प्राथमिकता रखी जाए।
- पीड़िता सुरक्षा: अदालतों में गवाह कमरे (child witness room) और गोपनीयता (नाम/पहचान छुपाने की व्यवस्था) कानूनन लागू करें। मानसिक सहायता और पुनर्वास के लिए अनिवार्य कराएं (व्यवस्थाओं को बुनियादी अधिकार मानते हुए)। गवाह सुरक्षा निधि बढ़ाएं। पीड़ित को सरकारी सहायता (शिक्षा, स्वास्थ्य, पुनर्वास) कानूनी रूप से गारंटी दी जाए।
- डिजिटल अपराधों की व्याख्या: आधुनिक रूपों जैसे ऑनलाइन ग्रूमिंग, डेटिंग ऐप पर शोषण, deepfake सामग्री आदि को स्पष्ट रूप से धारा 11 (यौन उत्पीड़न की परिभाषा) में शामिल करें। तकनीकी सबूत-संग्रह (डेटा, चैट, सोशल मीडिया रेकॉर्ड) तेज हो, डिजिटल फोरेंसिक लैबों को और सशक्त करें। साइबर अपराध में बाल यौन अपराध लिए समन्वित कानूनबद्ध नियंत्रण गाइडलाइंस बनाने चाहिए।
- सीमा पार अपराध: ट्रैफ़िकिंग और ऑनलाइन पोर्न जैसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय समन्वय बढ़ाएं। प्रशासक स्तर पर सहयोगी समझौते (MLATs) दृढ़ करें जिससे आरोपी विदेश भागे तो प्रत्यर्पण सुगम हो।
- सज़ाओं की समीक्षा: धारा 14 में न्यूनतम सजाएँ पहले से कठोर हैं, लेकिन स्पष्टीकरण हेतु श्रेणियां जोड़ें – जैसे बचपन शोषण, नशीले पदार्थ सेवन कराकर शोषण, शिक्षा संस्थान में शोषण आदि पर अलग से दंड बढ़ाया जाए। झूठी शिकायत/सबूत रद्द करने की शर्तें क्लियर हों।
- पुनर्वास एवं मुआवजा: धारा 33A अंतर्गत पीड़ितों को त्वरित मुआवजा और सरकारी सहायता का प्रावधान करें। वंचित परिवारों के लिए आर्थिक अनुदान बढाएँ। पुनर्वास कैम्प/गृह (सनातन समाज) जैसी सुविधाएँ ज़िला स्तर तक विस्तृत हों।
इन संशोधनों से अधिनियम और अधिक बाल-केंद्रित और व्यवहारिक बनेगा। सभी संशोधन प्रस्तावों के पीछे उद्देश्य बच्चे की सुरक्षा का सर्वाधिक हित सुनिश्चित करना होना चाहिए।
नीतिगत एवं परिचालनात्मक अनुशंसाएँ
(क) तात्कालिक (1 वर्ष): जनजागरण अभियान (स्कूली कार्यशालाएँ, मीडिया आदि) चलाएँ; पुलिस/डॉक्टरों का POCSO प्रशिक्षण अनिवार्य करें; Childline तथा 181/1098 जैसी हेल्पलाइन सेवाएँ 24×7 सक्रिय रखें; सामुदायिक जागरूकता पखवाड़े आयोजित करें; झूठी शिकायतों की बजाय प्रोफ़ेशनल रिपोर्टर (पत्रकार/परामर्शदाता) की संरक्षा सुनिश्चित करें।
(ख) मध्यम अवधि (1–3 वर्ष): विद्यालय पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा जोड़ें; डिजिटल बच्चों की सुरक्षा पर जागरूकता बढ़ाएँ; राज्य स्तर पर बाल सुरक्षा बल (multi-sector task force) गठित करें; सभी पुलिस थानों में SJPU कक्षाएं संचालित हों; ICPS के तहत पालना घरों/गोद लेने की सुव्यवस्था सुदृढ़ करें; न्यायालयों में वाद क्रम संख्या को नंबर ट्रैकिंग सिस्टम से मॉनिटर करें।
(ग) दीर्घावधि (3–7 वर्ष): सामाजिक परिवर्तन हेतु बच्चों के अधिकारों को शामिल करते हुए व्यापक शिक्षा सुधार करें; लैंगिक संवेदनशीलता को निजी/सार्वजनिक दोनों शिक्षा प्रणालियों में शामिल करें; राज्य-द्वारा-नियंत्रित पुनर्वास केंद्र (नीलमंदी, कौशल विकास) स्थापित करें; पुर्नवास-पीछे का ट्रैक रखने हेतु राष्ट्रीय बाल सुरक्षा सूचना प्रणाली बनाएं; साइबर सुरक्षा बिल (डिजिटल व्यक्तिगत डेटा) को प्रभावी रूप से लागू करें।
समन्वयात्मक मॉडल (मोेडल फ्रेमवर्क)
सिफारिश है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक बाल सुरक्षा परामर्श समितियाँ गठित की जाए (WCD, गृह मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, स्वास्थ्य, एनसीपीसीआर, पुलिस आदि के प्रतिनिधि), तथा प्रत्येक राज्य/जिला स्तर पर भी समन्वय इकाइयाँ (State/District Child Protection Unit) बनें। इन इकाइयों में पुलिस, CWC, बाल संरक्षण अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, NGO तथा तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हों। सूचना आदान-प्रदान के लिए एक केंद्रीकृत पोर्टल स्थापित करें जिसमें अपराधी विवरण, केस स्टेटस, पीड़ितों के पुनर्वास डेटा दर्ज हों। विभिन्न मंत्रालय/विभागों के कार्यक्रमों (स्कूल सुरक्षा, बाल स्वास्थ्य, जन संस्कृति) को नियमित इंटर-सेक्टर बैठक के जरिये जोड़कर कार्य करें।
केस हैंडलिंग मार्गदर्शिका (फ्लोचार्ट)
बच्चे द्वारा यौन अपराध की सूचना मिलने पर त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। नीचे दिया गया प्रवाह-चित्र (Mermaid flowchart) रिपोर्टिंग से पुनर्वास तक के मार्ग को दर्शाता है:
इस प्रवाह में हर चरण पर संबंधित एजेंसियाँ (पुलिस, स्वास्थ्य, न्यायपालिका, CWC/NGO) समन्वय से काम करेंगी, ताकि बाल पीड़ित को न्याय मिलने के साथ सुरक्षित वातावरण व पुनर्वास भी मिल सके।
स्रोत एवं संदर्भ
उपरोक्त विश्लेषण में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की वार्षिक रिपोर्ट, पीआईबी एवं समाचार प्रकाशनों के ताज़ा डेटा का उपयोग किया गया है। उदाहरणतः, पोस्को अधिनियम की धाराओं और सजाओं का विवरण सरकारी पीआईबी से प्राप्त हुआ। NCRB रिपोर्टों के माध्यम से अपराधों की प्रवृत्ति और आंकड़े जोड़े गए। पीड़ितों और समाज की चुनौतियों पर शोध तथा विशेषज्ञों की टिप्पणियाँ समाचार और अनुसंधान से ली गई हैं। उपरोक्त निष्कर्षों के लिए तर्क और अनुमानों की पुष्टि उपलब्ध सरकारी/वैध स्रोतों से की गई है।
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